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सोनारी दोमुहानी में आयोजित टुसू मेले में उमड़ा जन सैलाब, आदिवासी और मूलवासी समाज की परंपरागत नृत्य और गीतों ने मेले की शोभा बढ़ाई

श्री दर्पण न्यूज़, जमशेदपुर : झारखंडी संस्कृति और आस्था का प्रतिक टुसू पर्व के मौके पर सोनारी के दो मुहानी घाट पर बुधवार को जन सैलाब उमड़ पाड़ा। बच्चों के लिए झूले और खिलौनों से पटे इस मेले का अद्भूत नजारा और इसकी खूबसूरती देखते ही बनती है।

परंपरागत गीत नृत्य और ढोल नगाड़े की धुन ने मेले की रौनकता बढ़ाई

नृत्य संगीत और ढोल नगाड़े के बीच हजारों युवक युवतियों ने मेले का जमकर आनंद उठाया। इस मौके पर आदिवासी और मूलवासी समाज परंपरागत मिलन बड़ा ही सराहनीय रहा। इस समागम का लोगों ने जमकर आनंद उठाया। सदियों से चले आ रहे परंपरागत टुसू मेला आदिवासी और मूलवासी समाज का सामूहिक उत्सव होता है। इस मौके पर समाज के लोग परंपरागत और पुराने परिधान में होते हैं।

झारखंडी कला संस्कृति मंच करता है मेला का आयोजन

झारखंडी कला संस्कृति मंच की ओर से आयोजित इस मेले में महिला और पुरुष बड़ी संख्या में भाग लेते हैं। दूसरे जिले के भी परम्मरिक मान्यताओं से जुड़े लोग इस मेले में शिरकत करते हैं और मेले का आनंद उठाते हैं। इस मौके पर पत्रकारों से बातचीत करते हुए आयोजन समिति के प्रमुख और झारखंड 20 सूत्री कार्यक्रम समन्वय समिति के अध्यक्ष मोहन कर्मकार ने कहा कि यह मेल सदियों से मकर संक्रांति के मौके पर आयोजित होता है। यह मेला झारखंडी संस्कृत और कल का अद्भुत नमूना है। जिसमें आदिवासी और मूलवासी समाज के लोग शिरकत करते हैं। मोहन कर्मकार ने बताया कि टुसू पर्व समाज के बीच अपनी मान्यताओं के अनुरूप मनाया जाता है। धान की फसल काटने के बाद लोग चूड़ा और गुड़ पीठा बनाकर अपने घर में इस पर्व को उल्लास के साथ मानते हैं और नई फसल से तरह-तरह के व्यंजन तैयार करते हैं।

आयोजन समिति हर वर्ग की सुविधाओं का रखती है मेले में ख्याल

उन्होंने बताया की आसपास और दूर दराज के लोग बिना किसी भेदभाव के मेले में आते हैं। आयोजन समिति हर तरह के लोगों का मेले में स्वागत करती है और उन्हें किसी तरह की परेशानी ना हो इसकी भी व्यवस्था करती है। मोहन कर्मकार ने इस मौके पर समाज के सभी लोगों को शुभकामनाएं दी और कहा कि यह मेले की परिपाटी आगे भी चलती रहे यही उनकी कामना है। यह मेला मानव मूल्यों के साथ एकीकृत समाज का निर्माण करता है और समाज को जोड़ने का काम करता है। सामाजिक सरोकार के साथ-साथ एक दूसरे के मिलन का भी यह मेला प्रतीक है। वर्ष भर लोग अपने-अपने कार्यों और पेशे में व्यस्त रहते हैं । उन्हें एक दूसरे से मिलने का मौका नहीं मिलता है। लेकिन टुसू मेला के मौके पर आदिवासी और मूलवासी समाज के लोग बिना किसी भेदभाव के इकट्ठा होते हैं। समाज का हर वर्ग एक दूसरे से मिलता है और मिलजुल कर हर्षोल्लास के साथ मेले का आनंद उठाया है। लोग गीत नृत्य के साथ एक दूसरे से मिलते हैं और उसका आनंद उठाते हैं।

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