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भारतीय पर्वत एवं नदी संरक्षण अधिनियम हेतु उच्च स्तरीय संगोष्ठी

​श्री दर्पण, जमशेदपुर: देश की पर्वत शृंखलाओं और नदियों पर बढ़ते संकट को देखते हुए विधायक सरयू राय और जलपुरुष राजेंद्र सिंह के संरक्षण में 22 और 23 मई 2026 को जमशेदपुर के मोतीलाल नेहरू पब्लिक स्कूल में एक उच्च स्तरीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य पर्वतों और नदियों के संरक्षण हेतु एक सशक्त विधिक ढांचा तैयार करना है।

प्रमुख बिंदु एवं अधिनियम की आवश्यकता:

  • विधिक शून्यता: वर्तमान में पहाड़ों और नदियों के लिए कोई स्पष्ट वैधानिक परिभाषा या समर्पित कानून नहीं है। वर्तमान में ये केवल वन एवं प्रदूषण नियंत्रण कानूनों के अधीन हैं, जो इनके अस्तित्व की रक्षा के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
  • संवैधानिक आधार: संविधान के अनुच्छेद 48A (पर्यावरण रक्षा) और 51A(g) (नागरिक कर्तव्य) के आलोक में भारत सरकार को एक नया ‘भारतीय पर्वत संरक्षण एवं संवर्धन अधिनियम’ बनाने की आवश्यकता है।
  • पारिस्थितिक संकट: हिमालय, अरावली, पश्चिमी घाट जैसी शृंखलाएं अवैध खनन, अनियंत्रित पर्यटन, वनों की कटाई और जलवायु परिवर्तन के कारण गंभीर खतरे में हैं।

प्रस्तावित अधिनियम के मुख्य प्रावधान:

  • राष्ट्रीय प्राधिकरण की स्थापना: एक ‘राष्ट्रीय पर्वत संरक्षण प्राधिकरण’ का गठन हो, जिसमें वैज्ञानिकों, सरकारी प्रतिनिधियों और सामाजिक विशेषज्ञों की भागीदारी हो।
  • क्षेत्रीय वर्गीकरण: पर्वतीय क्षेत्रों को उनकी संवेदनशीलता के आधार पर ‘मुख्य संरक्षण क्षेत्र’, ‘बफर क्षेत्र’ और ‘सतत उपयोग क्षेत्र’ में वर्गीकृत किया जाए।
  • कठोर प्रतिबंध: मुख्य क्षेत्रों में बड़े बांधों, खनन और पारिस्थितिकी को नुकसान पहुँचाने वाली गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध हो। किसी भी परियोजना से पूर्व भूगर्भीय प्रभाव आकलन और जनसुनवाई अनिवार्य की जाए।
  • स्थानीय अधिकार: आदिवासी और पारंपरिक समुदायों के वनाधिकार (2006) को सुरक्षित रखते हुए, संसाधनों के लाभ में उनकी हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए।
  • दंड का प्रावधान: नियमों के उल्लंघन को संज्ञेय अपराध मानते हुए 5 वर्ष तक के कारावास और 10 लाख से 50 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रस्ताव है।

नदी संरक्षण एवं आगामी कदम:

​संगोष्ठी में इस बात पर जोर दिया गया है कि नदियाँ मात्र जल संसाधन न होकर जीवन का आधार हैं। भ्रष्टाचार और उपेक्षा के कारण नदियाँ गंदे नालों में तब्दील हो रही हैं। इस कार्यक्रम के माध्यम से विशेषज्ञों द्वारा तैयार किए गए विधेयक के प्रारूप (Draft Bill) को भारत सरकार को सौंपा जाएगा, ताकि संसद द्वारा इन्हें कानून के रूप में पारित किया जा सके।

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