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बरवाअड्डा विवाद पर जेएचआरसी का कड़ा रुख, जनप्रतिनिधि की भाषा गलत है तो पुलिस को भी संस्कारी और जवाबदेह होना जरूरी

श्री दर्पण न्यूज़, जमशेदपुर: डुमरी विधायक जयराम महतो और बरवाअड्डा थाना प्रभारी रवि कुमार के बीच कथित विवाद अब केवल एक जनप्रतिनिधि और पुलिस अधिकारी के बीच का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह पुलिस व्यवस्था में आम नागरिक के अधिकार, पुलिस की जवाबदेही और कानून के समान अनुपालन से जुड़ा व्यापक सवाल बन गया है।

पुलिस एसोसिएशन द्वारा थाना प्रभारी के पक्ष में खड़े होने के बाद इस मामले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर भी बहस तेज हो गई है। ऐसे समय में झारखंड मानवाधिकार सम्मेलन -जेएचआरसी ने पुलिस एसोसिएशन के रुख पर सवाल उठाते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है।

जेएचआरसी के केंद्रीय प्रमुख मनोज मिश्रा ने कहा कि हालिया मीडिया रिपोर्टों के अनुसार विधायक जयराम महतो और थाना प्रभारी के बीच कथित बातचीत का ऑडियो सामने आया है। यदि विधायक ने किसी पुलिस अधिकारी के प्रति अपशब्दों का इस्तेमाल किया है, तो जेएचआरसी उसका समर्थन नहीं करता।

उन्होंने कहा, “संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से भाषा और आचरण की मर्यादा की अपेक्षा होती है। लेकिन लोकतंत्र में जवाबदेही एकतरफा नहीं हो सकती। पुलिस भी संविधान और कानून के अधीन है। वर्दी किसी को नागरिकों के मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं रखती।”

“पुलिस को थर्ड डिग्री का अधिकार किस कानून ने दिया?”

मनोज मिश्रा ने कहा कि जेएचआरसी का मूल सवाल यह है कि जब आम नागरिक के साथ पुलिस हिरासत में मारपीट, प्रताड़ना या कथित थर्ड डिग्री की शिकायतें सामने आती हैं, तब पुलिस एसोसिएशन उतनी ही मजबूती से अपने विभाग की जवाबदेही की मांग क्यों नहीं करता?

उन्होंने कहा, “आम नागरिकों से पुलिस द्वारा शालीनता और सम्मानजनक भाषा में व्यवहार नहीं किए जाने की शिकायतें अक्सर सामने आती हैं। ऐसे मामलों में पुलिस एसोसिएशन की जवाबदेही और भूमिका पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।”

एफआईआर दर्ज नहीं करने की शिकायतों पर भी जेएचआरसी गंभीर

जेएचआरसी ने थानों में शिकायत या एफआईआर दर्ज नहीं किए जाने की शिकायतों को भी गंभीर मुद्दा बताया है।

मनोज मिश्रा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अनेको फैसले मे यह कहा है कि, यदि दी गई सूचना से संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है तो एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। किसी नागरिक को केवल पुलिस की इच्छा के आधार पर प्राथमिकी दर्ज कराने से वंचित नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा, “जिस पुलिस से आम नागरिक न्याय की पहली उम्मीद करता है, अगर वही शिकायत दर्ज करने में आनाकानी करे तो पीड़ित आखिर जाए कहां? एफआईआर दर्ज करना पुलिस की कृपा नहीं, बल्कि कानून द्वारा निर्धारित जिम्मेदारी है।”

पुलिस की साख पर भी आत्ममंथन करे एसोसिएशन

मनोज मिश्रा ने कहा कि पुलिस एसोसिएशन को केवल अपने सदस्य के पक्ष में खड़े होने के बजाय जनता के बीच पुलिस की गिरती साख और पुलिस व्यवस्था में बढ़ते अविश्वास पर भी गंभीरता से आत्ममंथन करना चाहिए।

उन्होंने कहा, “किसी पुलिसकर्मी के साथ दुर्व्यवहार गलत है और उसकी शिकायत पर कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन पुलिस एसोसिएशन की जिम्मेदारी केवल अपने सदस्य का बचाव करना नहीं, बल्कि पुलिस व्यवस्था में जनता का विश्वास बनाए रखना भी है।”

उन्होंने स्पष्ट कहा, “वर्दी सम्मान का प्रतीक है, जवाबदेही से छूट का लाइसेंस नहीं।”

“कानून सबके लिए बराबर है”

जेएचआरसी ने स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि जनप्रतिनिधि की गरिमा भी जरूरी है और नागरिकों के मानवाधिकार भी। किसी जनप्रतिनिधि द्वारा पुलिस अधिकारी के साथ अमर्यादित व्यवहार स्वीकार्य नहीं है, उसी तरह पुलिस कर्मी या अधिकारी द्वारा किसी नागरिक या जनप्रतिनिधि के साथ कानून और मर्यादा के विपरीत व्यवहार भी स्वीकार्य नहीं हो सकता।

मनोज मिश्रा ने कहा, “कानून सबके लिए बराबर है—पुलिस के लिए भी और जनप्रतिनिधि के लिए भी। लोकतंत्र में पद से अधिक महत्वपूर्ण संविधान और कानून की मर्यादा है।

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