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जुबली डायमंड गिरवी रखकर जिसने गढ़ा भारत का भविष्य: सर दोराबजी टाटा की अनदेखी दास्तान

श्री दर्पण न्यूज़, जमशेदपुर : एक ऐसा दौर, जब औपनिवेशिक हुकूमत भारतीय क्षमताओं पर सवाल उठाती थी और राहों में सिर्फ बीहड़ जंगल व अनिश्चितताएं थीं, तब एक इंसान ने भारत को आत्मनिर्भर बनाने का बीड़ा उठाया। वह नाम था, सर दोराबजी टाटा। अपने पिता जमशेदजी टाटा के सपनों को केवल आगे ही नहीं बढ़ाया, बल्कि देश के औद्योगिक, वैज्ञानिक और खेल जगत की ऐसी मजबूत नींव रखी, जिस पर आज का आधुनिक भारत खड़ा है।

साकची के जंगलों से ‘जमशेदपुर’ तक का ऐतिहासिक सफर

सीमित पूंजी, दुर्गम परिस्थितियां और ब्रिटिश शासन की उदासीनता भी दोराबजी के इरादों को डिगा न सकीं। उन्होंने साकची के बीहड़ जंगलों को देश के पहले वृहत इस्पात संयंत्र (TISCO) में बदल दिया।

जब शहर का नाम जमशेदपुर पड़ा

प्रथम विश्व युद्ध में जब इस संयंत्र ने 2,90,000 टन इस्पात की आपूर्ति की, तो ब्रिटिश सरकार भी नतमस्तक हुई और इस शहर का नाम जमशेदजी टाटा के सम्मान में ‘जमशेदपुर’ रखा गया।

जब भीषण आर्थिक संकट ने इस स्टील प्लांट के अस्तित्व पर खतरा मडराया, तब दोराबजी और उनकी पत्नी लेडी मेहरबाई ने अपनी पूरी निजी संपत्ति—यहाँ तक कि अनमोल ‘जुबली डायमंड’—भी गिरवी रख दी, लेकिन उद्योग को बंद नहीं होने दिया।

भारतीय ओलंपिक के असली ‘पितामह’

सर दोराबजी टाटा केवल इस्पात तक सीमित नहीं थे, वे भारतीय खेलों के सबसे बड़े संबल थे।

एंटवर्प ओलंपिक (1920) में भारतीय दल को पहली बार अंतरराष्ट्रीय मंच पर भेजने के लिए उन्होंने व्यक्तिगत रूप से वित्तीय मदद दी।

भारतीय ओलंपिक संघ के पहले अध्यक्ष

1927 में स्थापित भारतीय ओलंपिक संघ (IOA) के वे पहले अध्यक्ष बने और देश में संगठित खेलों का मार्ग प्रशस्त किया।

टाटा स्टील की वर्तमान खेल विरासत, जैसे 5 विश्वस्तरीय खेल अकादमियां और 19 खेल विधाओं में प्रशिक्षण।

टाटा आर्चरी अकादमी की स्थापना के साथ साथ 25 वर्षों में 180+ कैडेट्स और 8 ओलंपियन दिए।

टाटा फुटबॉल अकादमी (TFA) की स्थापना ने भारतीय फुटबॉल की आधारशिला रखी। 300 से अधिक कैडेट्स, जिनमें से 150+ खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय टीम का प्रतिनिधित्व किया।

अन्य संस्थाएं 

नवल टाटा हॉकी अकादमी, टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन और मैराथन-शतरंज प्रतियोगिताएं।

उद्योग से अलग हटकर उन्होंने विज्ञान, स्वास्थ्य और समाज निर्माण मैं अपनी अहम भूमिका निभाई। दोराबजी टाटा की दूरदृष्टि ने भारत को कई ऐतिहासिक और प्रतिष्ठित संस्थान दिए।

ऊर्जा क्षेत्र

पश्चिमी घाटों में तीन जलविद्युत परियोजनाओं से ‘टाटा पावर’ की नींव रखी।

सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट – इसी ट्रस्ट के वित्तीय संबल से आगे चलकर IISc बेंगलुरु, TISS, टाटा मेमोरियल अस्पताल, TIFR और NCPA जैसे राष्ट्रीय धरोहर रूपी संस्थान अस्तित्व में आए।

1932 में जब सर दोराबजी का निधन हुआ तो वे पीछे सिर्फ उद्योग नहीं, बल्कि एक स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर भारत का खाका छोड़ गए थे। उनकी 167वीं जयंती पर यह स्मरण केवल इतिहास को दोहराना नहीं, बल्कि उस निस्वार्थ राष्ट्र-सेवा को नमन करना है जिसने भारत की तकदीर बदल दी।

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