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विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर सदर अस्पताल में एक दिवसीय कार्यशाला का सफल आयोजन

श्री दर्पण न्यूज़, जमशेदपुर : विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के सप्ताहव्यापी कार्यक्रमों के तहत सोमवार को सदर अस्पताल, खास महल, परसुडीह में एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। सिविल सर्जन डॉ. साहिर पाल द्वारा उद्घाटित इस कार्यक्रम में मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. दीपक गिरी ने तनाव, शुरुआती लक्षणों और इसके सामाजिक पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाना और समाज से ‘स्टिग्मा’ (कलंक) को दूर करना था।

इस अवसर पर सिविल सर्जन के साथ-साथ मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. दीपक गिरी, डॉ. महेश मांझी, जिला विधिक सेवा प्राधिकार के पैरा लीगल वॉलंटियर्स (PLVs) और सदर अस्पताल की नर्सिंग टीम ने सक्रिय रूप से भाग लिया।

मानसिक बीमारी के शुरुआती लक्षण और पहचान

कार्यशाला को संबोधित करते हुए डॉ. दीपक गिरी ने कहा कि आज के दौर में हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में तनाव से जूझ रहा है, लेकिन एक सामान्य और बेहतर जीवन बनाए रखना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। उन्होंने मानसिक बीमारी के निम्नलिखित प्रमुख आरंभिक लक्षणों की चर्चा की। उन्होंने बताया कि अक्सर दुखी रहना और अत्यधिक चिंता करना, एकाग्रता (Concentration) का अभाव,

नींद से जुड़ी समस्याएं और बार-बार जल्दी गुस्सा आना, तनाव का सामना करने में असमर्थता और खुद की देखभाल न कर पाना,नशे का अत्यधिक उपयोग इसके शुरुआती लक्षण हैं।

बचाव और राहत के उपाय

डॉ. गिरी ने मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने के लिए कुछ बेहतरीन और व्यावहारिक सुझाव दिए। उन्होंने बताया कि प्रकृति के सानिध्य में समय बिताना और समय का सदुपयोग करना, सकारात्मक सोच रखना तथा दोस्तों और प्रियजनों से खुलकर बात करना, संगीत सुनना, किताबें पढ़ना, योग व व्यायाम करना तनावमुक्त रहने के लिए खुलकर हंसना जैसे कार्य मानसिक रोग से बचाव के उपाय हैं।

पैरा लीगल वॉलंटियर्स की भूमिका और सामाजिक जागरूकता

डॉ. दीपक गिरी ने विशेष रूप से पैरा लीगल वॉलंटियर्स को संबोधित करते हुए कहा कि वे ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर लोगों को जागरूक करें। ग्रामीण इलाकों में शिक्षा के स्तर की कमी के कारण लोग मानसिक बीमारियों को समझ नहीं पाते और समय पर चिकित्सक तक नहीं पहुंच पाते। ऐसे में वॉलंटियर्स की जिम्मेदारी है कि वे लोगों को बीमारी के बारे में बताएं, बेहतर जीवन जीने के टिप्स दें और जरूरत पड़ने पर उन्हें डॉक्टर से मिलने की सलाह दें।

स्टिग्मा (कलंक) और संदेह जैसी सामाजिक समस्याएं

कार्यक्रम के दौरान इस बात पर जोर दिया गया कि मानसिक बीमारी के मूल में ‘कलंक’ (Stigma) की बहुत बड़ी भूमिका होती है। किसी व्यक्ति पर मानसिक बीमारी का ठप्पा लगाना या सामाजिक कलंक जोड़ना भेदभाव को जन्म देता है और जो स्थिति को और गंभीर बना देता है। इसके अलावा, किसी पर लगातार संदेह करना भी इस बीमारी को उग्र रूप दे सकता है। इन नकारात्मक कारकों से बचकर ही समाज को स्वस्थ और मानसिक रूप से सुरक्षित बनाया जा सकता है।

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